Tuesday, December 04, 2007

हाइकु दिवस समारोह 2007

हाइकु दिवस पर प्रो० सत्यभूषण वर्मा की याद

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हाइकु कविता आज दुनिया की तमाम भाषाओं में लिखी जा रही है तथा वर्तमान में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सर्वाधिक चर्चित हाइकु कविता ही है। मूल रूप से जापान की इस कविता भारत में कविवर रवीन्द्र नाथ टैगोर ने प्रवेश कराया इसके बाद अज्ञेय जी ने हाइकु से प्रभावित होकर हाइकु जैसी लघु आकार की कविताओं की रचना की और जापानी हाइकु कविताओं के अनुवाद किए जिसने हिन्दी साहित्य संसार को प्रभावित किया। इसके बाद जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में जापानी भाषा के पहले प्रोफेसर डा० सत्यभूषण वर्मा ने हाइकु को भारतवर्ष में इस तरह प्रचारित व प्रसारित किया कि आज हिन्दी हाइकु कविता काफी लोकप्रिय है। प्रोफेसर वर्मा ने जापानी से सीधे हिन्दी में हाइकु कविताओं के अनुवाद किए जिससे हाइकु की मूल आत्मा को लोगों ने समझा। डा० वर्मा की ७५ वीं वर्षगाँठ को हाइकु दिवस के रूप में ४ दिसम्बर २००७ को कविनगर गाजियाबाद में समारोह पूर्व मनाया गया।
अनुभूति तथा अभिव्यक्ति वेबपत्रिका और हाइकु पत्रिका 'हाइकु दर्पण' के तत्वावधान एवं कथाकार गज़लकार कमलेश भट्ट कमल के संयोंजन में आयोजित इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम में जहाँ हाइकु कविता के ध्वजावाहक तथा भारत के जापानी भाषा के पहले प्रोफेसर स्व० डॉ० सत्यभूषण वर्मा को उनकी ७५ वीं वर्षगाँठ के अवसर पर याद किया गया, वहीं हाइकु पर केन्द्रित दो महत्वपूर्ण पुस्तकों युगाण्डा की अनिवासी भारतीय हाइकुकार डॉ० भावना कुँअर के पहले हाइकु संग्रह 'तारों की चूनर' तथा डॉ० अंजली देवधर के सम्पादन में प्रकाशित ''विश्व भर से बच्चों के हाइकु हाइकु प्रवेशिका' का लोकार्पण भी किया गया।
पुस्तकों का परिचय तथा देश में हाइकु कविता की गति-प्रगति की विस्तृत जानकारी 'हाइकु दर्पण' पत्रिका के सम्पादक तथा कार्यक्रम के मुख्य अतिथि डॉ० जगदीश व्योम द्वारा दी गयी। डा० व्योम ने बताया कि अकेले हिन्दी में ही २०० से अधिक हाइकु संग्रह/ संकलन प्रकाशित हो चुके हैं, उधर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर इंटरनेट पर लगभग एक लाख हाइकु केन्द्रित वेबसाइटें हैं।
'विश्वभर से बच्चों के हाइकु - हाइकु प्रेविशिका' (डा० अंजली देवधर) को उन्होंने दुनिया भर के बच्चों द्वारा लिखी गयी हाइकु कविताओं का अंग्रेजी व हिन्दी में एक साथ प्रकाशित अनूठा द्विभाषिक संकलन बताया तथा
तारों की चूनर को किसी प्रवासी भारतीय द्वारा सर्वप्रथम प्रकाशित हाइकु संग्रह बताया। दोनों पुस्तकों की सभी ने मुक्तकण्ठ से प्रशंसा।
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रख्यात गीतकार एवं 'गीताभ' संस्था के अध्यक्ष ओम प्रकाश चतुर्वेदी पराग ने की। समारोह में सुप्रसिद्ध बिल्डर एवं कवि बी० एल० गौड़ विशिष्ट अतिथि थे। कार्यक्रम का प्रारम्भ अनुराधा भट्ट की सांगीतिकी वाणी वन्दना से हुआ तथा संचालन कमलेश भट्ट कमल द्वारा किया गया। कार्यक्रम में चित्रकार जितेन साहू द्वारा हाइकु की प्रयोगशीलता की चर्चा की गयी। राजनाथ तिवारी डॉ० मधु भारतीय, अंजू जैन द्वारा हाइकु कविताएँ प्रस्तुत की गयीं। आयोजन में वरिष्ठ कथाकार से० रा० यात्री, कवि कृष्ण मित्र, पत्रकार कुलदीप तलवार तथा हरदोई के कवि एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी महादेव प्रसाद शर्मा, डॉ० अतुल जैन, कवयित्री नेहा वैद की उपस्थिति भी उल्लेखनीय रही।

प्रस्तुति : अनुराधा भट्ट
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तारों की चूनर पर अनुभूति की संपादक पूर्णिमा वर्मन के कुछ विचार उनके ब्लाग पर




* समारोह के कुछ चित्र

Tuesday, October 24, 2006

हाइकु दिवस-2007 : रूपरेखा


प्रोफेसर सत्यभूषण वर्मा के 75 वें जन्म दिन को हाइकु दिवस के रूप में मनाया जा रहा है। भारत में जगह जगह कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
दिल्ली गाजियाबाद में कमलेश भट्ट कमल के आवास पर आयोजित समारोह में प्रो० वर्मा द्वारा हिन्दी हाइकु के लिए किए गए कार्यों की चर्चा होगी।

दो महत्वपूर्ण हाइकु पुस्तकों का लोकार्पण होगा।

इंटरनेट पर हिन्दी हाइकु की स्थिति से अवगत कराने के लिए डा० जगदीश व्योम तथा पूर्णिमा वर्मन शारजाह द्वारा वेबसाइट के प्रदर्शन का कार्यक्रम होगा।

अनेक देशों में रह रहे प्रवासी भारतीय नेट पर उपस्थित रहकर अपनी सहभागिता करेंगे।

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हाइकु दिवस के अवसर पर हाइकु की दो महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, ये पुस्तकें हैं-

१ विश्वभर के बच्चों के द्वारा लिखी गई अनेक भाषाओ की हाइकु कविताओं के हिन्दी अनुवाद सहित पहली बार प्रकाशित पुस्तक-

विश्व भर से बच्चों के हाइकु
हाइकु प्रवेशिका (डा० अंजली देवधर)




किसी प्रवासी भारतीय हाइकुकार की हाइकु कविताओं का सर्व प्रथम हाइकु संग्रह तारों की चूनर हाइकुकार (डा० भावना कुँअर, युगांडा)




हाइकु दिवस के अवसर पर हाइकु की दो महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, ये पुस्तकें हैं
१ विश्वभर के बच्चों के द्वारा लिखी गई उनेक भाषाओ की हाइकु कविताओं के हिन्दी अनुवाद सहित पहली वार प्रकाशित पस्तक
विश्व भर से बच्चों के हाइकु
हाइकु प्रवेशिका
डा० अंजली देवधर
२ किसी प्रवासी भारतीय हाइकुकार की हाइकु कविताओं का सर्व प्रथम हाइकु संग्रह
तारों की चूनर
हाइकुकार डा० भावना कुँअर युगांडा

हाइकु दिवस, दिसम्बर 2007

हाइकु कविता के ध्वजावाहक प्रो० सत्यभूषण वर्मा
४ दिसम्बर ७५ वीं वर्षगाँठ पर विशेष : हाइकु कविता के ध्वजावाहक प्रो० सत्यभूषण वर्मा
-कमलेश भट्ट कमल
कलेवर की दृष्टि से दुनिया की सबसे छोटी काव्य विधा के रूप में चर्चित 'हाइकु' यूँ तो कविता की जापानी शैली है, किन्तु विगत ०९ दशकों से यह कविता हिन्दी समेत विभिन्न भारतीय भाषाओं में भी जानी पहचानी और लिखी जा रही है। ५, ७, ५ के वर्णक्रम में मात्र १७ अक्षरों वाली इस त्रिपदी कविता की भारत में १९१७ में प्रथम चर्चा का श्रेय जहाँ रवीन्द्रनाथ टैगोर को जाता है, वहीं हिन्दी में इसके प्रवर्तक अज्ञेय माने गए हैं जिन्होंने वर्ष १९५९ में अपने काव्य संग्रह 'अरी ओ कस्र्णा प्रभामय' में कुछ अनूदित हाइकु तथा कुछ हाइकु प्रभावित रचनाएँ दीं। किन्तु हाइकु कविता को उसके लम्बे शैशव काल से बाहर निकालकर आन्दोलन की स्थिति तक पहुँचाने का श्रेय जाता है जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के जापानी भाषा विभाग के पूर्व अध्यक्ष एवं प्रोफेसर स्व. डॉ० सत्यभूषण वर्मा को ।०४ दिसम्बर १९३२ को रावलपिण्डी(पाकिस्तान) में जन्में प्रो० वर्मा जापानी भाषा के भारत के पहले प्रोफेसर थे। उन्होंने अन्तर्देशीय पत्र पर निकाले गए अत्यन्त लघु पत्रक 'हाइकु' द्वारा हाइकु के प्रचार प्रसार का वह कमाल कर दिखाया, जो अर्च्छी अच्छी पत्रिकाओं के माध्यम से भी संभव नहीं हो पाता है। १९७८ में उन्होंने इसके लिए भारतीय हाइकु क्लब की स्थापना की तथा फरवरी ७८ से अगस्त ८६ तक प्रकाशित 'हाइकु' के २६ अंकों ने हिन्दी ही नहीं अन्य भारतीय भाषाओं में भी हाइकु सृजन को आन्दोलन का स्वरूप प्रदान करने की आधार पीठिका तैयार की।हाइकु जैसी ही छोटी कद काठी और वैसी ही सादगी, ऋजुता और गम्भीरता जहाँ वर्मा जी के व्यक्तित्व का हिस्सा थी, वहीं अनथक श्रमशीलता, कार्य के प्रति समर्पण और प्रतिवद्धता ने उन्हें कार्मयोगी बना डाला। जापान और वहाँ की संस्कृति उनके रोम रोम में बसी थी और वर्ष में चार छ: जापान यात्राएँ उनकी नियमितचर्यो का हिस्सा थीं। जापान से भारत आने वाले तथा भारत से जापान जाने वाले विभिन्न महत्वपूर्ण प्रतिनिधि मण्डलों में प्रो० वर्मा की हिस्सेदारी किसी न किसी रूप में अवश्य होती थी। वे सही अर्थों में भारत और जापान के बीच सांस्कृतिक सेतु की तरह थे और उनकी इसी छवि का संज्ञान लेते हुए वर्ष १९९६ में जापान सम्राट की ओर से नई दिल्ली में 'दि आर्डर आफ राइजिंग सन: गोल्ड रेज विद रोसेट' नामक महत्वपूर्ण सम्मान से सम्मानित किया गया था। दूसरी ओर हाइकु कविता के प्रचार प्रसार में उनकी महत्वपूर्ण और अत्यन्त उपयोगी भूमिका तथा दीर्घकालिक योगदान के लिए उन्हें दिसम्बर २००२ में जापान में हाइकु कविता के अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान से भी पुरस्कृत किया गया था।जापानी के साथ साथ चीनी, उडिया, बाँगला, अंग्रेजी, हिन्दी आदि कई भाषाओं के विद्वान प्रो० वर्मा ने स्वयं हाइकु सृजन नहीं किया, लेकिन सीधे जापानी से भारतीय भाषाओं में हाइकु के अनुवाद का अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य करते हुए उन्होंने इस विधा से भारतीय रचनाकारों का साक्षात्कार कराया। उससे पूर्व हाइकु अंग्रेजी अनुवादों के माध्यम से ही लोगों तक पहुँचा था और उसकी कोई स्पष्ट छवि, शिल्प या दर्शन सुनिश्चित नहीं था। उनकी पुस्तक 'जापानी हाइकु और आधुनिक हिन्दी कविता ने उनके हाइकु मिशन को पूरा करने में अत्यन्त महत्वूर्ण योगदान किया। उससे पूर्व उनकी अनूदित पुस्तक 'जापानी कविताएँ' वर्ष १९७७ में ही प्रकाशित हो चुकी थी। जापान में प्रकाशित पहले जापानी हिन्दी शब्दकोश की रचना करके उन्होंने दोनों भाषाओं के बीच एक सुदृढ़सेतु के निर्माण का भी उल्लेखनीय कार्य किया। अनुवाद के क्षेत्र में किए गए उनके कार्यों को अत्यन्त सम्मान से याद किया जाता है।प्रो० वर्मा भारत में हाइकु सम्बन्धी हर गतिविधि के केन्द्र १३ जनवरी २००५ को अपनी मृत्यु के ठीक पूर्व तक बने रहे। १९८८ में उनके द्वारा निर्मित हाइकु केन्द्रित लघु वृत्त चित्र 'स्माल इज़ द ब्यूटीफुल' विधा के लिए उनका एक अन्यतम योगदान रहा, जिसे जापान में पुरस्कृत भी किया गया था। उनकी प्रतिबद्धता और उनके प्रयासों का ही परिणाम था कि मेरठ तथा लखनऊ विश्वविद्यालयों में हाइकु केन्द्रित शोध हुए तथा अन्य कई विश्वविद्यालयों ने हाइकु को शोध के लिए चुना।हाइकु कविता केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं हो गयी कि वह आयातित विधा थी। आयातित तो सॉनेट भी था, लेकिन त्रिलोचन शास्त्री से आगे यह कहाँ बढ़ पाया? हाइकु के साथ ऐसी स्थिति नहीं है। हिन्दी में सैकड़ों रचनाकार निरंतर हाइकु सृजन कर रहे हैं। और तो और भोजपुरी जैसी क्षेत्रीय भाषाओं में भी कई दर्जन रचनाकारों ने हाइकु पर गम्भीर कार्य किया है। शताधिक हाइकु संग्रह व संकलन इस दिशा में किए जा रहे कार्यों के प्रमाण हैं। हिन्दी के अलावा गुजराती, सिन्धी, असमिया, बँगला, मराठी आदि भाषाओं में भी हाइकु में प्रचुर सृजन हुआ है।१७ अक्षरों के कलेवर की संक्षिप्तता ने आज के अत्यन्त व्यस्त समय में लोगों के लिए साहित्य सृजन और पठन पाठन के नये आयाम जोड़े हैं। कदाचित इसीलिए इसे इक्कीसवीं सदी की कविता के रूप में भी देखा गया है। संक्षिप्तता ने ही हाइकु के विभिन्न व्यावसायिक व अन्य प्रयोगों के भी द्वार खोले हैं। चित्रकार जितेन साहू ने हाइकु कविताओं को दीवारों और पत्थरों पर चित्रित करके हाइकु वाटिकाएँ सजाई है तो घरों के पर्दों पर हाइकु पेन्ट करके उनमें नयी जान फूँकी है। कलाकार पारस दासोत ने भी दीवारों और समाधि प्रस्तरों पर हाइकु के उत्कीर्णन की पहल की है। संक्षिप्तता की वजह से ही हाइकु कविताओं के सिरैमिक, फर्नीचर, टेक्सटाइल, ग्लास, स्टेशनरी जैसे कितने ही उद्योगों मे प्रायोग की संभावनाओं की तलाश की जा सकती है। सिनेकारों ने तो हाइकु की तर्ज पर तीन शॉट वाले 'सिनेकु' की शुरुआत भी कर दी है। बंगलूरू के के.रामचन्द्र बाबू ने ऐसे कोई आधा दर्जन सिनेकु की रचना की है, जिनका प्रदर्शन त्रिवेन्द्रम अर्न्तराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में २००६ में किया जा चुका हैहम देखते हैं कि एक आदमी की सार्थक पहल और प्रतिबद्धता कितने बड़े और व्यापक सृजन तथा बदलाव की भूमिका तैयार कर सकती है, प्रो० सत्यभूषण वर्मा इसके अप्रतिम उदाहरण हैं। भारत में जब भी, जहाँ भी हाइकु की चर्चा होगी, प्रो० वर्मा का नाम इसके ध्वजावाहक के रूप में लिया जाता रहेगा।

-कमलेश भट्ट कमल
के. एल १५४, कविनगर
गाजियाबाद २०१००२(उ० प्र०)
मो० ९९६८२९६६९४

विविध लिंक

* हाइकु दर्पण का हाइकु दिवस अंक

विविध फोटो





डा० नामवर सिंह और देवेन्द्र सत्यार्थी के साथ प्रो० सत्यभूषण वर्मा











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